उदयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्यभर में शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने वाले “डमी छात्रों” के मुद्दे पर सख्ती दिखाते हुए जाँच टीम गठित करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने साफ कहा है कि शिक्षा बच्चों का अधिकार है और इसमें किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। उदयपुर सहित कई शहरों के नामी कोचिंग संस्थानों में लंबे समय से डमी प्रवेश की शिकायतें मिल रही थीं। इनमें प्रमुख रूप से शहर के हिरण मगरी स्थित एलन कोचिंग संस्थान का नाम सामने आया है, जिस पर छात्रों को डमी दाखिलों के जरिए पढ़ाने और उनके भविष्य से खिलवाड़ करने के आरोप लगे हैं।
क्या है डमी प्रवेश का खेल?: डमी छात्र वे होते हैं, जिनका नाम किसी स्कूल में औपचारिक रूप से दर्ज तो रहता है, लेकिन वे नियमित कक्षाओं में नहीं जाते। ऐसे छात्रों को केवल बोर्ड परीक्षा के समय स्कूल में उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बुलाया जाता है। पूरा साल ये छात्र केवल कोचिंग संस्थानों में ही पढ़ाई करते हैं। इससे न केवल स्कूल शिक्षा का महत्व कम होता है, बल्कि बच्चों का सर्वांगीण विकास भी बाधित होता है। खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों और सामाजिक कौशल से वे वंचित रह जाते हैं। इस संबंध में एलन इंस्टिट्यूट के उदयपुर हेड शांतनु विजयवर्गीय से डमी छात्रों को लेकर बात करने की कोशिश की तो उन्होंने अपना ग़ैर जिम्मेदार रवैया अपनाते हुए मीडिया से बात करने से माना कर दिया तथा छात्रों को धमकाया कि अगर किसी ने मीडिया से बात करने की कोशिश की तो उन्हें कोचिंग से हटा दिया जाएगा ।
उदयपुर से उठी चिंगारी: हाल ही में जयपुर के कुछ अभिभावकों और शिक्षकों ने याचिका दायर कर हाईकोर्ट का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि यहां संचालित एलन कोचिंग संस्थान में 1500 से अधिक संख्या में छात्र डमी दाखिलों के आधार पर पढ़ रहे हैं। इन छात्रों का नाम स्कूल में दर्ज है, लेकिन वे पूरे साल कक्षाओं में दिखाई नहीं देते। स्कूल प्रबंधन भी इस स्थिति से अनजान नहीं है, बल्कि उन्हें कोचिंग संस्थानों से मिलीभगत कर फायदा पहुँचाया जाता है।
हाईकोर्ट का रुख: याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और शिक्षा विभाग को फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि डमी प्रवेश न केवल शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है, बल्कि बच्चों के भविष्य को भी अंधकारमय बना रहा है। न्यायालय ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इस मामले की गहन जांच करवाई जाए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो।
हाईकोर्ट ने जाँच कमेटी गठन करने का आदेश दिया है। यह टीम उदयपुर सहित पूरे राजस्थान में चल रहे कोचिंग संस्थानों और संबद्ध स्कूलों की जांच करेगी। एसआईटी को निश्चित समयावधि में रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने माना है कि डमी छात्रों की समस्या वर्षों से मौजूद है, लेकिन इस पर ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई। अब कोर्ट के आदेश से उम्मीद है कि इस पर लगाम कसी जाएगी।
विशेषज्ञ बताते हैं कि यह प्रथा मुख्य रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले बड़े कोचिंग संस्थानों में चलती है। इनमें मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं (NEET, JEE) की तैयारी कराने वाले संस्थान सबसे आगे हैं।
कोचिंग उद्योग पर सवाल: राजस्थान विशेषकर कोटा, उदयपुर, जयपुर और जोधपुर देशभर में कोचिंग उद्योग के लिए जाने जाते हैं। हर साल लाखों छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए यहां आते हैं। लेकिन इस उद्योग में पारदर्शिता और नैतिकता को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। उदयपुर एलन का सेंटर हेड शांतनु विजयवर्गीय बच्चों के बेग में स्कूल की ड्रेस कोचिंग आते समय रखवाता है की जब भी स्कूल में कोई इंस्पेक्शन आ जाए तो कोचिंग से छात्रो को सीधे स्कूल भेजा जा सके ।
शिक्षाविदों का मानना है कि कोचिंग संस्थान केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणामों पर ध्यान देते हैं। छात्र बोर्ड परीक्षा में कैसे पास होंगे, इसकी व्यवस्था डमी प्रवेश के माध्यम से कर दी जाती है। स्कूलों को आर्थिक लाभ और संस्थानों को प्रतिष्ठा मिलती है, लेकिन नुकसान केवल छात्रों का होता है।
छात्रों और अभिभावकों की राय : कुछ छात्रों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि डमी प्रवेश के कारण वे स्कूल की गतिविधियों से पूरी तरह कट जाते हैं। “पूरा साल कोचिंग सेंटर और हॉस्टल में ही बीत जाता है। न खेल, न सांस्कृतिक कार्यक्रम, न दोस्ती। केवल किताबें और टेस्ट सीरीज।”
अभिभावकों का कहना है कि वे बच्चों को बेहतर भविष्य दिलाने के लिए कोचिंग का सहारा लेते हैं, लेकिन उन्हें भी यह प्रणाली खलती है। “अगर स्कूल और कोचिंग संस्थान मिलकर बच्चों की शिक्षा दें, तो शायद डमी छात्रों की समस्या ही खत्म हो जाए।”
शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की चेतावनी: शिक्षा विशेषज्ञ का कहना है, “डमी प्रवेश बच्चों को एकांगी बना देता है। वे सिर्फ प्रतियोगी परीक्षा पास करने की मशीन बन जाते हैं। सामाजिक और भावनात्मक विकास रुक जाता है। हाईकोर्ट का कदम स्वागत योग्य है, लेकिन इसे लागू करना चुनौतीपूर्ण होगा।”
वरिष्ठ अधिवक्ता राम कृपा शर्मा का कहना है कि यह शिक्षा कानून और बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन है। अदालत की निगरानी में होने वाली जांच से सच्चाई सामने आएगी।


