
उदयपुर। उदयपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित भल्लो का गुड़ा ग्राम पंचायत का एक छोटा सा गांव — खालिया, जहां शिक्षा की असली तस्वीर दिखाई देती है… वो तस्वीर जो चमचमाते सरकारी बयानों से दूर है। जहां न तो स्मार्ट क्लास है, न फर्नीचर, और न ही सुरक्षित छत। हां, लोहे के सरिए ज़रूर छत से बाहर झांक रहे हैं, मानो कह रहे हों — “कब गिरें और कब किसी मासूम की ज़िंदगी लील लें!”
झालावाड़ जिले में हाल ही में स्कूल की छत गिरने से सात बच्चों की मौत ने पूरे राजस्थान को झकझोर कर रख दिया था। मगर दुखद बात ये है कि उस हादसे के बाद भी जिम्मेदारों की आंख नहीं खुली। अब उदयपुर के इस खालिया गांव में सरकारी स्कूल के हालात उसी त्रासदी को दोहराने का खुला न्योता दे रहे हैं।

छत से झांकती मौत… और मासूम बच्चे खुले आसमान के नीचे :राजकीय प्राथमिक विद्यालय खालिया की हालत इतनी खराब है कि स्कूल भवन अब कब गिर जाए, कोई भरोसा नहीं। छत से लोहे के सरिए बाहर आ चुके हैं, दीवारें दरक रही हैं और फर्श की दरारों में बारिश का पानी रिसता रहता है। छात्रों को अब कमरे में बैठाना जोखिम भरा हो चुका है, इसलिए उन्हें खुले में ज़मीन पर बैठाकर पढ़ाया जा रहा है। मासूम बच्चों की नज़रों में किताबों की जगह डर समाया हुआ है, और अभिभावकों की आंखों में चिंता। स्कूल भेजते समय हर मां-बाप मन में यही दुआ करता है – “भगवान करे, आज कोई हादसा न हो।” यह कैसी शिक्षा नीति है जहाँ पढ़ाई से पहले जान बचाना ज़रूरी हो गया है?

तीन साल से गुहार, लेकिन जवाब में आई चुप्पी: स्कूल की प्रधानाध्यापिका ने बताया कि पिछले तीन सालों से लगातार शिक्षा विभाग, पंचायत समिति, जनप्रतिनिधियों और अन्य जिम्मेदार अफसरों को पत्र लिखे गए। हर बार आश्वासन मिला – “हां, करवाते हैं… जल्दी होगा।” लेकिन “जल्दी” कभी आई ही नहीं।
ग्रामीणों का कहना है कि वे खुद भी कई बार अधिकारियों को मौके पर ले गए। हालत दिखाई, बच्चे दिखाए, दरकी दीवारें दिखाई, मगर हर बार सिर्फ वादे मिले — काम नहीं। आज हालत यह है कि बच्चों की शिक्षा खुले आसमान के नीचे, धूप-बारिश के भरोसे हो रही है।

भविष्य के लिए खौफ और सरकार की लापरवाही
सरकार ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून की बातें करती है, लेकिन क्या यही शिक्षा का अधिकार है? जहां न भवन सुरक्षित है, न बच्चों की जान? क्या हादसे होने का इंतजार है? क्या फिर किसी जिला कलेक्टर को “सस्पेंड” कर देने से बच्चों की मौत की भरपाई हो जाएगी? यह मामला सिर्फ खालिया गांव का नहीं, यह पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता की तस्वीर है। झालावाड़ में 7 बच्चों की मौत के बाद भी अगर स्कूलों की मरम्मत नहीं होती, तो साफ है कि बच्चों की जानों का कोई मोल नहीं है।



