लखावली गांव के जंगलों में बिराजित है कुकड़ेश्वर महादेव

यहां भी अपने संघर्ष के दौरान रुके थे महाराणा प्रताप

मेवाड़ में भगवान महादेव के कई मंदिर है जहां भोलेनाथ के दर पर भक्तों की भारी भीड़ रहती है और भोलेनाथ से ऐसी आस्था मेवाड़ के हर मंदिर में दिख जाती है और कई अति प्राचीन मंदिर महादेव के इस मेवाड़ में है जहां बरसों पुराना इतिहास और इतिहास भी ऐसा जिसे हर कोई जानना चाहता है।उदयपुर शहर से 12 किमी दूर लखावली गांव के पास हरे भरे जंगल में यह मंदिर श्रद्धा और पर्यटन का संगम है। बताते है की इस मंदिर का शिवलिंग कैलाशपुरी के एकलिंगजी मंदिर के दौर का है। हालांकि यह अस्तित्व में करीब 575 साल पहले महाराणा प्रताप के काल में आया था। इससे जुड़ी कई लोक मान्यताएं भी हैं, जो इस शिव धाम की विशिष्टता को दर्शाती हैं।मंदिर के पुजारी मोहन गिरि बताते है की मुगलों से संघर्ष के दौरान महाराणा प्रताप ने लखावली के इस जंगल में भी कुछ समय बिताया था। यहां एक कच्चे मंदिर में प्रवास के दौरान एक रात प्रताप विश्राम कर रहे थे। तभी एकाएक मुगलों के भेदिये और शत्रु सेना के कुछ सैनिक इस ओर बढ़ने लगे। प्रताप इससे बेखबर थे। कहा जाता है कि संयोग से कुकड़े (मुर्गे) ने आधी रात को बांग दे दी, जिससे महाराणा प्रताप जाग गए। उन्होंने खुद को सुरक्षित कर लिया। तब से यह मंदिर कुकड़ेश्वर महादेव के नाम से जाना जाने लगा। सरपंच मोहन पटेल ने बताया मंदिर के बगल में नाला बहता है। इसकी विशेषता है कि कितनी भी गर्मी हो, लेकिन पानी कभी नहीं सूखता। श्रद्धालु इसे भोले के नित्य अभिषेक से जोड़ते हैं। पास में एक कुंड भी है। यह भी कभी नहीं सूखा श्रावण मास में श्रद्धालु इसी पवित्र जल से कुकड़ेश्वर महादेव का अभिषेक करते हैं। सरपंच पटेल के मुताबिक रविवार को अधिकांश शहरवासी भी बड़ी संख्या में कुकड़ेश्वर पहुंचते हैं। जबकि हर सोमवार इस शिव धाम पर मेले जैसी रंगत होती है।