भगवान जगन्नाथ क्यों आए मेवाड़? जानिए उदयपुर के जगदीश मंदिर से जुड़ी यह पौराणिक कथा

उदयपुर। मेवाड़ की पावन भूमि पर स्थित भगवान जगदीश का मंदिर न केवल स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है, बल्कि एक ऐसी गाथा भी समेटे हुए है जो आस्था, भक्ति और दिव्यता की मिसाल है। क्या आप जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ स्वयं पुरी से मेवाड़ क्यों आए? आइए जानते हैं इस पौराणिक कथा के पीछे का रहस्य, जो मेवाड़ की राजपरंपरा और आध्यात्मिकता से जुड़ा हुआ है।

भगवान जगन्नाथ के पुरी से मेवाड़ आगमन की कथा: मेवाड़ के महान शासक महाराणा जगत सिंह को यह दिव्य शक्ति प्राप्त थी कि वे जगन्नाथ पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ के दर्शन अपने स्वप्न में प्रतिदिन कर सकते थे। यह उनके जीवन का नियमित आध्यात्मिक क्रम बन गया था।
लेकिन एक दिन यह चमत्कारिक क्रम अचानक टूट गया। महाराणा को स्वप्न में भगवान दर्शन नहीं दिए। व्याकुल महाराणा ने अन्न-जल त्याग कर प्रभु की भक्ति में लीन हो गए। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में उन्हें दर्शन दिए और आदेश दिया –

मेवाड़ में मेरे लिए एक मंदिर बनाओ, मैं स्वयं वहां आऊंगा।”

मीरा का वचन और डूंगरपुर से आई प्रतिमा: यह मान्यता भी जुड़ी हुई है कि भगवान श्रीकृष्ण ने मीरा बाई को वचन दिया था कि वे एक दिन मेवाड़ जरूर आएंगे। संभवतः यही समय था। भगवान की आज्ञा के अनुसार महाराणा ने भव्य मंदिर निर्माण करवाया। भगवान की प्रतिमा के लिए डूंगरपुर के पाश्वश शरण पर्वत से विशेष मूर्ति लाई गई। यह वही स्थान है जहां महाभारत काल में कृष्ण और जयसंघ के युद्ध के दौरान आग लगी थी और तब श्रीकृष्ण ने भविष्यवाणी की थी

“कलियुग में इस पर्वत की प्रतिमाएं पूजी जाएंगी।”



स्वर्ण कड़ों से मिला भगवान के आने का प्रमाण: प्रतिमा स्थापना के समय महाराणा जगत सिंह के मन में शंका थी – क्या इस प्रतिमा में भगवान स्वयं विराजेंगे?तभी एक चमत्कार हुआ। स्वप्न में भगवान ने महाराणा को संकेत दिया
पुरी में जो स्वर्ण कड़े तुमने मुझे पहनाए थे, यदि वे कड़े इस प्रतिमा के हाथों में आ जाएं, तो समझ लेना कि मैं स्वयं मेवाड़ आ गया हूं।”जब मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा चल रही थी, तभी प्रतिमा के हाथों में वही चार सोने के कड़े अपने आप आ गए। यह एक अलौकिक चमत्कार था। तभी से माना गया कि भगवान जगन्नाथ ने पुरी से मेवाड़ में पदार्पण कर लिया।

आज भी लाखों भक्तों का केंद्र: आज भी यह मंदिर मेवाड़वासियों की आस्था का केंद्र है। यहाँ प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु भगवान के दर्शन करते हैं। मंदिर की राजस्थानी स्थापत्य कला, नक्काशीदार स्तंभ, और मनोहारी शिखर देश-विदेश से पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।